Friday, July 24, 2009

शतरंज की बिसात

शतरंज! चौसठ काले सफ़ेद खानों में विभिन्न चालें चलते दो राजा और उनके साथी। दो खिलाड़ी आमने-सामनेबैठ, अपने जीवन भर का अनुभव बटोर, चंद मोहरों को तरह-तरह से इस्तेमाल कर, एक दुसरे को मात देने केलिएललायित रहते हैं। शतरंज मात्र एक खेल नही, ये एक दूसरी दुनिया है जहाँ खिलाड़ी अपने से ज्यादा दूसरे के दिमाग को पढने की कोशिश करते हैं। बचपन से ही, इस खेल ने मुझे हमेशा अपनी ओर खींचा है। मेरा भाई ही मेरा स्वाभाविक कोच रहा।

मेरा भाई, जिसे मैं दद्दा कहता हूँ, मुझसे मात्र दो वर्ष बड़ा है। उम्र का अंतर कम होने की वजह से हम हमेशा दोस्त बन के ही रहे। एक प्रगाड़ दोस्ती के बंधन से बंधे। कभी भी मुझे सहारे, सीख, या कोई भी जरूरत पड़ी, मैंने हमेशा दद्दा की ओर ही देखा।और मात्र देखा ही नही, बल्कि हमेशा अपने करीब पाया। तो दद्दा ने ही मुझे शतरंज सिखाई, हालाँकि कभी कभी मैंउसे हरा भी देता था।

उस सुबह भी वहां सड़क किनारे शतरंज की बिसात बिछी थी। दो बुजुर्ग बैठे खेल का आनंद ले रहे थे। मैं भी उनके करीब पहुँच गया। कुछ और लोग भी वहां जमा थे। बाजी बड़ी रोचक स्तिथि में थी। मैं भी उस खेल का भाग बन गया।में देख रहा था कि अगर घोड़े कि सही चाल इस वक्त चल दी जाय तो शह और मात हो सकती है. ज्यादातर, खिलाड़ियों के बजाय न खेलने वाले, बाहर से, ज्यादा अच्छी चालें सोच लेते हैं. शायद ऐसा इसलिये होता है के उनपर जीत-हार का दबाव नहीं होता. खैर, मैंने इंतज़ार करना तय करा. कुछ क्षण बीत जाने के बाद, मेरे हाथ बरबस आगे बढे और, घोड़े कि सटीक चाल चलते हुए मैंने कहा, शह और मात. बरबस ही वहां सन्नाटा छा गया और उसी क्षण सभी जमा लोग कह उठे वाह! क्या चाल है. मैं हारे हुए खिलाड़ी के आँखों में नाराजगी साफ़ तौर से पढ़ सकता था. मैंने आँखों ही आखों में उनसे बिना कुछ कहे माफी मांग ली और मैंने देखा के तत्क्षण माफी मिल भी गयी. उन्होंने पुछा, "कौन हो, किसके यहाँ आये हो?" दरअसल पहाड़ों में गाँव छोटे होते हैं और तकरीबन सभी लोग एक दूसरे को जानते हैं. मेरे परिचय देने के बाद उन्होंने चाय आर्डर कर दी वहां सभी के लिए. हम मशगूल रहे काफी देर तक कुछ यहाँ की कुछ वहां की कहने-सुनने में. थोड़ी ही देर में अच्छी घनिष्ठता हो गयी. एक कड़क चाय पीने के बाद मैंने उनसे इजाजत माँगी. मिलते रहना के आदेश के साथ उन्होंने इजाजत दी.

समय काफी हो चला था. और मुझे लग रहा था के घर में बता के न आये होने की वजह से सब परेशान होंगे. मेरे कदम तेजी से घर की और बढ़ चले. घर पहुंचा तो रेनू ने बनावटी गुस्से के साथ पूछा के कहाँ गए थे, यहाँ घर में लोग फिक्र कर रहे थे. मैंने माफ़ी मांगी और कमरे में चला गया.

Tuesday, June 3, 2008

एक सुबह भीगी सी!

कई बार से कोशिश कर रहा था की ताल के किनारे कुछ पल बिताऊँ। हर बार नौकुचिया ताल आता पर ताल न जा पाता। इस बार सोच लिया था की जाना ही है। रात कुछ ज्यादा ही काली होती है पहाड़ों में। दरअसल प्रकाश प्रदूषण कम होता है यहाँ। सप्तर्षि मंडल की चमक कुछ ज्यादा ही होती है शहरों के अपेक्षा। हलकी हलकी ठंडक कमरे में तब भी थी जब के खिड़की दरवाज़े सब बंद थे। किसी के दरवाज़ा खोलने पर सिहरन सी दौड़ जाती थी। रात गुजर गयी बातों ही बातों में। रेनू से काफी दिन बाद मिला था उस दिन। हमने रात को ही सोच लिया की सुबह जल्द से जल्द निकल जायेंगे ताल के किनारे।

सुबह कब हो गयी पता ही न चला। एक अलसाई सुबह कोहरे के आगोश में कड़ाके की ठंड के साथ इंतज़ार कर रही थी मेरा। रेनू उठ कर अपने कार्यों में व्यस्त हो चुकी थी, हमेशा की तरह। मैं यूं ही चल पड़ा ताल की ओर। बहुत छोटेपन से मुझे पानी के केनारे बेहद पसंद हैं। ताल के किनारे चहलकदमी करते हुए यूं ही दूर तक चला जाना अच्छा लग रहा था। सुबह की सर्द और नम हवाएँ अंतर्मन को भीगो रही थीं। चंद अनजाने चेहरे, मुझे पहचानने की कोशिश करते आते-जाते दिख जाते। ताल के चारों ओर घूम लेने के बाद मुझे एहसास हुआ कि घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे। काफी समय बीत चुका था और सूरज भी उदय हो चुका था। वहीं रोड के किनारे कुछ दुकाने भी खुल गयी थीं.. कुछ बुजुर्ग एक मेज़ के किनारे बैठे थे। मैंने अभी उन्हें पार किया ही था के एक आवाज़ आयी "तुम्हारी चाल"... मुझे लगा शायद किसी ने मुझसे कुछ कहा. पीछे मुड़ के देखा तो वह शतरंज खेल रहे थे।

मेरे कदम ख़ुद बा ख़ुद उस और मुड़ गए जहाँ शतरंज की बिसात बिछी थी। कुछ बुजुर्ग चेहरे चारों ओर जमा थे. ....

Friday, May 16, 2008

नीड़ का निर्माण

बहुत चाह थी कि एक आशियाना हो मेरा जहाँ मैं कुछ भी बोल सकूं, कुछ भी कह सकूं। अंग्रेज़ी की जरूरत, या कहें मजबूरी, कहीं न कहीं रोक लेती थी मेरी अभिव्यक्तियाँ। नही कह पता था मैं अपने मन की, सबसे, सब कुछ। आज अपना नीड़ बना लिया है गूगल के घर। अब उड़ सकता हूँ मैं पाखी बन कर। निकल सकता हूँ मैं दूर गगन में, देख सकता हूँ मैं दुनिया को एक नयी नज़र से। धन्यवाद गूगल!